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जेम्स डी. वॉटसन: डीएनए की संरचना के सह-अन्वेषक का निधन

 

PNS Bureau:-

जे

म्स डी. वॉटसन, जिन्होंने मात्र 25 वर्ष की आयु में डीएनए की संरचना की खोज में भाग लेकर विज्ञान के इतिहास में एक अमर स्थान प्राप्त किया, का गुरुवार को लॉन्ग आइलैंड के ईस्ट नॉर्थपोर्ट में निधन हो गया। उनकी आयु 97 वर्ष थी।
उनके पुत्र डंकन वॉटसन ने बताया कि वे हाल ही में संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती थे और इस सप्ताह उन्हें वहां से एक हॉस्पिस में स्थानांतरित किया गया था, जहाँ उनका निधन हुआ।

डीएनए की खोज और वैज्ञानिक विरासत

डॉ. वॉटसन की भूमिका डीएनए — जीवन का आनुवंशिक खाका — के रहस्य को सुलझाने में इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि इसी उपलब्धि ने उन्हें 20वीं शताब्दी के महानतम वैज्ञानिकों में स्थापित कर दिया। इस खोज ने उन्हें फ्रांसिस एच.सी. क्रिक के साथ 1962 में शरीर क्रिया विज्ञान या चिकित्सा के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया।

1953 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में कार्यरत वॉटसन और क्रिक ने यह सिद्ध किया कि डीएनए की संरचना “डबल हेलिक्स” यानी दोहरी कुंडली के रूप में होती है। यह उस समय जीवविज्ञान की दिशा बदल देने वाली खोज थी — जिसने आनुवंशिक रोगों, जीन-संशोधन (gene editing), और आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी के नए युग की नींव रखी।

रोज़ालिंड फ्रैंकलिन की भूमिका

डीएनए की संरचना के मॉडल के निर्माण में कैम्ब्रिज के वैज्ञानिकों को किंग्स कॉलेज, लंदन की रोज़ालिंड ई. फ्रैंकलिन और मॉरिस विल्किंस द्वारा प्राप्त एक्स-रे विवर्तन छवियों से सहायता मिली। “फोटो 51” नामक प्रसिद्ध छवि ने डबल हेलिक्स संरचना के रहस्य को उजागर किया।
हालाँकि उस समय की लैंगिक असमानताओं और वैज्ञानिक राजनीति के कारण फ्रैंकलिन को उचित मान्यता नहीं मिली — वे 1958 में 37 वर्ष की आयु में ही कैंसर से चल बसीं, और नोबेल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिया जाता।

आज फ्रैंकलिन को महिला वैज्ञानिकों की प्रतीक के रूप में सम्मानित किया जाता है, जबकि वॉटसन की पुस्तक “द डबल हेलिक्स” ने उनकी कहानी को जनसाधारण तक पहुँचाया।

कोल्ड स्प्रिंग हार्बर प्रयोगशाला और मानव जीनोम परियोजना

1968 में डॉ. वॉटसन कोल्ड स्प्रिंग हार्बर प्रयोगशाला के निदेशक बने। उन्होंने इस संस्थान को विश्व के प्रमुख आणविक जीवविज्ञान केंद्रों में परिवर्तित किया।
उनके नेतृत्व में इस प्रयोगशाला ने आनुवंशिकी और कैंसर अनुसंधान में अग्रणी भूमिका निभाई तथा बाद में वही मानव जीनोम परियोजना (Human Genome Project) का जन्मस्थल बनी।
इस परियोजना के पहले निदेशक के रूप में वॉटसन ने वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग और नैतिक पहलुओं के अध्ययन पर बल दिया। परियोजना का “कार्यशील मसौदा” 2000 में जारी हुआ और 2003 में इसे पूर्ण घोषित किया गया।

विवाद और पतन

2007 में वॉटसन ने एक साक्षात्कार में नस्ल से जुड़ी विवादास्पद टिप्पणियाँ कीं, जिसके बाद वैज्ञानिक समुदाय ने उनसे दूरी बना ली। कोल्ड स्प्रिंग हार्बर प्रयोगशाला ने उनके सभी मानद पद छीन लिए।
उनकी पुस्तक “Avoid Boring People” के प्रकाशन काल में यह विवाद अपने चरम पर था। बाद में उन्होंने खेद व्यक्त किया, लेकिन वैज्ञानिक जगत ने उन्हें पुनः स्वीकार नहीं किया।

जीवन, परिवार और उत्तरकाल

जेम्स डी. वॉटसन का जन्म 6 अप्रैल 1928 को शिकागो में हुआ था। उन्होंने 15 वर्ष की आयु में शिकागो विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया और एर्विन श्रॉडिंगर की पुस्तक “What Is Life?” से प्रेरित होकर आणविक जीवविज्ञान की ओर अग्रसर हुए।
उन्होंने इंडियाना विश्वविद्यालय से 1950 में डॉक्टरेट प्राप्त की और जल्द ही डीएनए अनुसंधान में अपना जीवन समर्पित किया।
वॉटसन ने 1968 में एलिज़ाबेथ लुईस से विवाह किया। उनके दो पुत्र हुए — रुफस और डंकन। वे जीवन के अंतिम वर्षों में लॉन्ग आइलैंड स्थित कोल्ड स्प्रिंग हार्बर में रहे।

डीएनए और मानवता की नई दृष्टि

डीएनए की दोहरी कुंडली की खोज ने न केवल विज्ञान को बल्कि मानवता की आत्म-धारणा को भी बदल दिया।
चार्ल्स डार्विन ने 1859 में लिखा था — “विरासत के नियम पूरी तरह अज्ञात हैं।”
वॉटसन और क्रिक की खोज ने इस अज्ञात को प्रकाश में लाया — यह दिखाया कि जीवन का कोड कैसे स्वयं की प्रतिलिपि बनाता है, और कैसे परिवर्तन से विकास (evolution) संभव होता है।

विरासत

जेम्स डी. वॉटसन का वैज्ञानिक योगदान —

  • डीएनए की संरचना की खोज
  • “द डबल हेलिक्स” जैसी प्रभावशाली आत्मकथा
  • मानव जीनोम परियोजना की पहल
  • और कोल्ड स्प्रिंग हार्बर प्रयोगशाला को विश्व स्तर का अनुसंधान केंद्र बनाना —
    इन सबने उन्हें आधुनिक जीवविज्ञान का आधार स्तंभ बना दिया।

उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिज्ञासा और विवादों के बावजूद, यह निर्विवाद है कि उन्होंने जीवन के रहस्य को समझने की दिशा में मानवता के सबसे बड़े कदमों में से एक का नेतृत्व किया। (PNS)

 

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