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बिहार

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 — बांकीपुर सीट पर वैश्य समाज की ‘राजनीतिक जागृति’ की जंग

रिपोर्ट: संजय वर्मा, पटना से

PNS Bureau:- पटना के बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में इस बार का चुनाव केवल दलों का नहीं, बल्कि “सम्मान बनाम उपेक्षा” की लड़ाई कहा जा सकता है। इस सीट पर करीब 90,000 वैश्य मतदाताओं की भारी आबादी होने के बावजूद, बीते तीन दशकों से भाजपा ने इस समाज को टिकट देने में लगातार परहेज़ किया है। पार्टी ने पिछले 30 वर्षों से लगातार कायस्थ समाज से उम्मीदवार — पहले नवीन किशोर सिन्हा और अब उनके पुत्र नितिन नवीन — को मैदान में उतारा है।

भाजपा के इस ‘पारंपरिक फार्मूले’ से अब वैश्य समाज में असंतोष उभरने लगा है।
इस बार राजद महागठबंधन ने इस असंतोष को भांपते हुए एक बड़ा दांव खेला है — वैश्य समाज की तेजतर्रार, शिक्षित और प्रखर वक्ता रेखा कुमारी गुप्ता को उम्मीदवार बनाकर।


🔹 जातीय समीकरणों का गणित

बांकीपुर सीट का जातीय परिदृश्य राजनीतिक दलों के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।

  • वैश्य: 90,000

  • दलित: 56,000

  • यादव: 48,000

  • मुस्लिम: 41,000

  • ब्राह्मण-भूमिहार-राजपूत: 40,000

  • कायस्थ: 35,000

  • कुर्मी-कोइरी: 28,000 (संयुक्त)

  • धानुक: 15,000

  • मारवाड़ी: 15,000

  • पंजाबी: 6,000

स्पष्ट है कि वैश्य समाज यहां निर्णायक स्थिति में है, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व अब तक शून्य रहा है। भाजपा की यह “कायस्थ परंपरा” अब टूटने के कगार पर दिख रही है।


🔹 “सम्मान बनाम गुलामी” का नारा

रेखा गुप्ता के समर्थन में स्थानीय वैश्य संगठनों और व्यापारिक समुदायों के बीच एक नई हवा बन रही है। पोस्टर और सोशल मीडिया अभियानों में नारा गूंज रहा है —

“अबकी बार वैश्य अधिकार — रेखा गुप्ता सरकार!”

रेखा गुप्ता ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा,

“यह चुनाव केवल किसी सीट का नहीं, बल्कि पूरे वैश्य समाज के आत्मसम्मान का है। अब समय है कि हम अपनी राजनीतिक पहचान खुद तय करें।”


🔹 भाजपा के लिए चुनौती

बांकीपुर सीट भाजपा का पारंपरिक गढ़ रही है।
नितिन नवीन लगातार तीन बार से यह सीट जीत रहे हैं, लेकिन अब उन्हें “एंटी-इनकंबेंसी” और “जातीय असंतोष” दोनों का सामना करना पड़ रहा है।
वैश्य समाज के एक वर्ग का कहना है कि भाजपा ने उन्हें “केवल वोट बैंक” की तरह इस्तेमाल किया, प्रतिनिधित्व नहीं दिया।


🔹 महागठबंधन की रणनीति

राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन ने रेखा गुप्ता की उम्मीदवारी को प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों बताया है।
गठबंधन का मानना है कि यदि वैश्य समाज का पूरा वोट बैंक रेखा गुप्ता के पक्ष में एकजुट होता है, तो यादव, मुस्लिम और दलित समुदायों के समर्थन से यह सीट आसानी से जीती जा सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह जीत “कायस्थ बाहुल्य सीट” के मिथक को तोड़ देगी।


🔹 पृष्ठभूमि और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

बांकीपुर सीट से भाजपा ने 1995 से अब तक हर चुनाव जीता है।
नवीन किशोर सिन्हा ने 1995, 2000 और 2005 में लगातार जीत दर्ज की,
जबकि 2010 से उनके पुत्र नितिन नवीन यह परंपरा जारी रखे हुए हैं।
इस दौरान वैश्य समाज के प्रतिनिधित्व की मांग कई बार उठी, लेकिन पार्टी ने टिकट नीति में कोई बदलाव नहीं किया।


🔹 निष्कर्ष

इस बार का चुनाव बांकीपुर में केवल सत्ता का नहीं, सम्मान और स्वाभिमान का भी प्रतीक बन गया है।
यदि रेखा गुप्ता को वैश्य समाज का पूरा समर्थन मिलता है, तो यह न केवल इस सीट का राजनीतिक समीकरण बदल देगा, बल्कि बिहार की राजनीति में वैश्य समाज के नए जागरण अध्याय की शुरुआत भी हो सकती है।(PNS)


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