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नबरंगपुर जिला में ट्राइबल समुदाय की ड्राय-फिश उत्पादन परंपरा

यदि इस पारंपरिक आजीविका को आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षण, बाज़ार- और सरकारी नीतियों के अन्तर्गत समायोजन के साथ जोड़ा जाए — तो यह  गरीबी उन्नयन के संदर्भ में  एक मॉडल बन सकती है।

Written By Senior Journalist Smt Pravati Bisoi 

PNS Bureau :-  नबरंगपुर जिला में ट्राइबल समुदाय की ड्राय-फिश उत्पादन की परंपरा में बहुत संभावनाएँ निहित हैं। यदि इस पारंपरिक आजीविका को आधुनिक उपकरण, प्रशिक्षण, बाज़ार-लिंकिंग और सरकारी नीतियों के अन्तर्गत समायोजन के साथ जोड़ा जाए — तो यह न सिर्फ स्थानीय लोगों की आमदनी बढ़ाने का साधन बन सकती है, बल्कि सामाजिक विकास और गरीबी उन्नयन (poverty alleviation) के संदर्भ में भी एक मॉडल बन सकती है।

प्रस्तावना / परिचय

Nabrangpur (नवरंगपुर) जिला, ओडिशा में ट्राइबल समुदाय (Adivasi) कई परंपरागत आजीविका पद्धतियाँ अपनाते हैं। एक ऐसी पद्धति है बारिश के मौसम में मछलियाँ इकट्ठा करना और उन्हें सुखा कर (dry fish) बेचना / उपयोग करना। यह नस्ल-भेद, आर्थिक कठिनाईयों और सीमित संसाधनों के बीच एक अवसर हो सकती है, यदि इसे बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जाए।

यदि इस प्रक्रिया में आधुनिक उपकरण, स्वच्छता, मूल्य-संघ, विपणन और मानकीकरण शामिल हो जाए, तो यह ट्राइबल परिवारों की आमदनी बढ़ा सकती है, गरीबी कम कर सकती है, और सामाजिक–आर्थिक उत्थान का माध्यम बन सकती है।

🐟 नवरंगपुर की ‘तुरु सुखुआ’ — मिट्टी की खुशबू और धुएँ का अनोखा स्वाद
ओड़िशा के घरों में पखाल (चावल का पानी) और सुखुआ (सूखी मछली) का रिश्ता उतना ही गहरा है जितना ओड़िया संस्कृति का अपनी परंपराओं से। जहाँ पखाल होता है, वहाँ सुखुआ ज़रूर होता है! पर नवरंगपुर ज़िले की ‘तुरु सुखुआ’ या ‘तुरुंजा सुखुआ’ का स्वाद सबसे अलग है।
इसकी खुशबू और स्वाद इतने लाजवाब हैं कि इसका दाम चाहे कितना भी बढ़ जाए — किलो के भाव पाँच से छह हज़ार रुपये तक — फिर भी लोग इसे ख़रीदने से पीछे नहीं हटते।

🌾 गाँव की मिट्टी, धुएँ और आग की खुशबू
तुरु सुखुआ को तैयार किया जाता है पूरी तरह देसी तरीके से।
बरसात के मौसम में जब तुरुंजा मछली नदियों और नालों से धान के खेतों में आ जाती है, तो गाँववाले उन्हें फँसाकर पकड़ते हैं।
इसके बाद मछली को साफ़ करके बाँस की चटाई पर चूल्हे के धुएँ और आग की आँच में सुखाया जाता है।
यह वही धुआँ और सुगंध है जो तुरु सुखुआ को उसका अनोखा स्वाद और पहचान देती है — एक बार जो खा ले, वह जीवन भर इसका स्वाद नहीं भूल पाता।

🛍️ बाज़ारों में सबसे हॉट आइटम
अगर आप नवरंगपुर के साप्ताहिक हाट में जाएँ, तो बाँस की टोकरी में सजी तुरु सुखुआ ज़रूर देखेंगे।
महिलाएँ ग्राहकों का इंतज़ार करती बैठी रहती हैं — कौन आएगा और उनकी सुखुआ खरीदेगा।
कोरापुट ज़िले में भी इसकी भारी माँग है।
चाहे दाम आसमान छू रहा हो, मगर इस स्वादिष्ट सुखुआ को लेने के लिए भीड़ हमेशा लगी रहती है।

🍛 हर घर की रसोई का स्वाद
तुरु सुखुआ को बहुत ही साधारण मसालों के साथ पकाया जाता है — प्याज, हरी मिर्च और टमाटर डालकर।
बस इतना काफी है कि थाली में चावल कम पड़ जाए!
कुछ लोग इसे सुखुआ चटनी, तरकारी या टमाटर झोला की तरह भी बनाते हैं।
हर रसोई में इसका अपना तरीका है — मगर स्वाद वही लाजवाब।

💊 औषधीय गुण और सेहत के फायदे
स्थानीय लोगों का मानना है कि तुरु सुखुआ में औषधीय गुण भी होते हैं।
छोटी मछली होने के कारण इसमें विटामिन और मिनरल्स की भरपूर मात्रा होती है, जो शरीर के लिए बेहद लाभदायक है।
इसे लंबे समय तक घर में सुरक्षित रखा जा सकता है क्योंकि यह पूरी तरह सुखाई जाती है —
इसलिए यह गाँवों में घर-घर की ज़रूरी चीज़ बन चुकी है।

⚠️ चुनौतियाँ और चिंता का विषय
हालाँकि, आजकल तुरुंजा मछली की संख्या घट रही है।
खेतों में बढ़ते रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से मछलियाँ मर रही हैं।
इसी वजह से इसकी कीमतें भी बढ़ती जा रही हैं।
फिर भी, स्थानीय लोग इस परंपरा और स्वाद को ज़िंदा रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

📝 निष्कर्ष:
नवरंगपुर की ‘तुरु सुखुआ’ सिर्फ एक भोजन नहीं, बल्कि गाँव की मिट्टी की महक, लोगों की मेहनत और ओड़िया संस्कृति की पहचान है।
यह एक ऐसा स्वाद है जो परंपरा, मेहनत और प्रकृति को जोड़ता है — और नवरंगपुर को ओड़िशा के स्वाद के नक्शे पर एक अलग पहचान देता है।

Visual By Senior Journalist Smt Pravati Bisoi

क्या प्रथा है?

  •  नबरंगपुर जिले में ट्राइबल समुदाय बारिश के मौसम (monsoon / rainy season) में खेतों (cultivated land) तथा अन्य पानी जमा रहने वाले क्षेत्रों (water-stalked areas) से मछलियाँ इकट्ठा करते हैं।
  • ये मछलियाँ संभवतः छोटे जल स्रोतों से आई होंगी: खेत में जलभराव, तालाब किनारों का पानी, नाले / अल्पजल स्रोत।
  • वे इन्हें धूप-सुखाने / अन्य तरीके से सुखाकर उन्हें ड्राय फिश रूप में परिवर्तित करते हैं, ताकि इन्हें स्टोर किया जा सके और बाज़ार में बेचा / उपभोग किया जा सके।
  • यह प्रक्रिया पारंपरिक है — संभवत: अतिरिक्त संसाधनों के अभाव में उपकरण सीमित हैं, और पैकेजिंग / स्वच्छता / विपणन नेटवर्क सीमित है।

चुनौतियाँ

कुछ संभावित चुनौतियाँ हो सकती हैं — जिन्हें देखें जाना चाहिए:

चुनौतियाँ विवरण
स्वास्थ्य / स्वच्छता पारंपरिक ड्राय फिश प्रक्रिया में संभव है कि धूल-मिट्टी, कीट-पंखी, पक्षी, जल संपर्क, अम्बाड़ आदि का जोखिम हो। यदि सुखाने की सतह, वातावरण स्वच्छ न हो, या संसाधन बेहतर न हों, तो उत्पाद की गुणवत्ता प्रभावित होगी।
मानकीकरण (Quality Standards) यदि उत्पादन छूटता है कि वह सुरक्षित आरोग्य-मानकों (food safety / hygiene) पर खरा उतरे, तो बाज़ार में बेचने में जोखिम बढ़ जाता है।
भंडारण और मार्केटिंग ड्राय फिश उत्पाद को रखने / पैक करने / ले जाने / बेचने का नेटवर्क हो सकता है कमजोर हो। मूल्य बारीकी नहीं मिल रही होगी, मध्यस्थों (middlemen) की भूमिका अधिक हो सकती है।
प्रौद्योगिकी एवं उपकरण की कमी सुखाने के लिए छउएँ (solar dryer / raised racks / ट्रे / नेटेड खांचे / पैकिंग मेसेजिंग), पैकेजिंग बॉक्स, लेबलिंग, सुरक्षित कंटेनर, कोल्ड स्टोरेज पासिबिलिटी आदि की कमी हो सकती है।
जलवायु एवं मौसम का अनिश्चित व्यवहार बारिश के बाद अतिरिक्त नमी, उमस (humidity), कीट / फंगस का खतरा; अव्यवस्थित जल निकासी आदि।
अधिकार एवं स्वामित्व के मुद्दे यदि समुदाय का पानी स्रोत अस्थायी है, या यदि खेत या जल स्रोत पर अधिकार सीमित है, तो लगातार संचालन का जोखिम हो सकता है।

अवसर

हालाँकि चुनौतियाँ हैं, अवसर भी बहुत अधिक हैं:

अवसर विवरण
स्थानीय संसाधन का उपयोग समुदाय के पास पहले से ही वह “कच्चा माल” है — अर्थात् बारिश में जमा होने वाली मछलियाँ, स्थानीय जल स्रोत। उन्हें फेंकने के बजाय उपयोग में लाना।
प्राकृतिक संरक्षण एवं पोषण ड्राय फिश में प्रोटीन युक्त सामग्री होती है, और यदि सुरक्षित तरीकों से तैयार हो, यह स्थानीय पोषण सुरक्षा का स्रोत बन सकती है।
स्थानीय रोजगार और आय सृजन प्रति परिवार कुछ अतिरिक्त आय स्रोत बन सकता है, विशेषकर महिला-समूह (SHG), सहकारी समिति मॉडल (Cooperative), या ट्राइबल विकास योजनाओं के अंतर्गत।
मानकीकरण और ब्रांडिंग यदि प्रभावी पैकेजिंग, लेबलिंग, बढ़ी गुणवत्ता, स्थानीय / प्रादेशिक ब्रांड (उदाहरण: “Nowrangpur Tribal Dry Fish”) बनाई जाए, तो उत्पाद की कीमत बढ़ सकती है और दूरस्थ बाजारों तक पहुंच बनाई जा सकती है।
सरकारी योजनाओं / स्कीमों का उपयोग केंद्र तथा राज्य की मत्स्य / ग्रामीण विकास योजनाएँ — जैसे कि Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana (PMMSY) — जैसी योजनाओं के अंतर्गत अनुदान / सहायता मिल सकती है। (dahd.gov.in)
तकनीकी हस्तक्षेप छोटे-मशीनरी, सोलर ड्रायर सिस्टम्स, raised drying racks, improved packaging बॉक्स, ट्रेनिंग व प्रशिक्षण (Hygiene, Food Safety) आदि। उदाहरण हैं ऐसे कई अन्य स्थानों पर प्रयोग हो रहे हैं (नीचे देखें)।

उदाहरण / प्रेरक मॉडल स्थान

नीचे कुछ अन्य स्थान या परियोजनाएँ जो मिलती-जुलती गतिविधियों से संबद्ध हैं:

उदाहरण विवरण
Odisha — Coastal Fisherwomen Hygienic Fish Drying Unit ICAR-DRWA ने मॉडल फिश ड्राइंग यूनिट बनाई है Penthakota, Puri, Odisha में, जिसे Coastal fisherwomen समुदायों के बीच hygienic फिश ड्राईंग / पैकेजिंग / मार्केटिंग सुधारने के लिए उपयोग किया गया है। (Indian Council of Agricultural Research) यह दिखाता है कि ओडिशा में तकनीकी हस्तक्षेप संभव है और प्रभावी रहा है।
Tripura — Tribal Women & Fermented / Dry Fish Business उदाहरण मिला है Tripura में, जहाँ ट्राइबल महिलाएँ “fermented dry fish” व्यवसाय कर रही हैं, और नई तकनीक अपनाई जा रही है। (India Today NE)
Manipur / ICAR Pen-Culture मॉडल यद्यपि यह बिल्कुल ड्राय फिश का मॉडल नहीं है, लेकिन यह दिखाता कि कैसे प्रौद्योगिकी हस्तक्षेप (पेन कल्चर, training, seeds / fingerlings) के माध्यम से ट्राइबल मछुआरे समूहों की आमदनी बढ़ाई जा सकती है। (Indian Council of Agricultural Research)
Tribal Fisher Cooperative / Value-Added Fish Products PMMSY / NFDB success stories में एक मॉडल है जहाँ ट्राइबल मछुआरों के सहकारी समितियों (co-operative society) को value-added fish processing facility मिली है (Nav Jeevan Tribal Fishermen Co-op Society, Khairwe) (pmmsy.dof.gov.in)

इन उदाहरणों से प्रेरणा लेकर, Nowrangpur के ट्राइबल समुदाय के ड्राय फिश व्यवसाय को बेहतर स्वरूप देना संभव है।

सुझाव – मंत्रालय / नीति हस्तक्षेप के लिए दिशा

यदि Ministry of Tribal Affairs / Ministry of Fisheries / राज्य सरकार इस पर हस्तक्षेप करना चाहें, तो निम्नलिखित कदम उपयोगी होंगे:

  1. लोकल सर्वे और डिज़ाइन-अध्ययन
    • पहले स्तर पर सर्वे करवाएं: कितनी संख्या में परिवार इस ड्राय फिश उत्पादन में लगे हैं, उनकी वर्तमान आय कितनी है, उत्पादन मात्रा, गुणवत्ता, पारंपरिक तरीके, चुनौतियाँ।
    • पर्यावरणीय सुरक्षा / स्वच्छता मानदंड की पहचान करें।
  2. क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण (Capacity Building / Skill Training)
    • ट्राइबल समुदाय के सदस्यों को फूड सेफ्टी, ग्रेडिंग / पैकेजिंग / विपणन / बुककीपिंग / ब्रांडिंग के बारे में प्रशिक्षण दें।
    • महिला स्वयं-सहायता समूह (SHGs) या सहकारी समितियाँ गठित करें।
  3. तकनीकी उपकरण एवं इक्विपमेंट प्रदान करना
    • सोलर-ड्रायर (solar dryers) / raised racks / ट्रे-बेस्ड ड्राइंग प्लेटफ़ॉर्म / नेटिंग / आदि सुविधाएँ।
    • पैकेजिंग बॉक्स, लेबलिंग मटेरियल, स्टोरेज ग्रेड कंटेनर।
  4. संस्थागत समर्थन एवं अनुदान

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